श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 39: सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.39.1 
ब्रह्मोवाच
नैव शक्या गुणा वक्तुं पृथक्त्वेनैव सर्वश:।
अविच्छिन्नानि दृश्यन्ते रज: सत्त्वं तमस्तथा॥ १॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - महर्षि! सत्व, रज और तम - इन गुणों का सर्वथा पृथक् वर्णन करना असम्भव है; क्योंकि ये तीनों गुण अविभाज्य (मिश्रित) देखे जाते हैं।॥1॥
 
Brahmaji said – Maharshi! It is impossible to describe these qualities - Sattva, Raja and Tama - completely separately; Because these three qualities are seen as inseparable (mixed). 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)