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mahabharat 14.38.5: ममता, अहंकार और आशा से रहित होकर, सर्वत्र समदृष्टि रखना तथा पूर्णतया निःस्वार्थ होना ही महापुरुषों का सनातन धर्म है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 14.38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.38.5 
निर्ममो निरहङ्कारो निराशी: सर्वत: सम:।
अकामभूत इत्येव सतां धर्म: सनातन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
ममता, अहंकार और आशा से रहित होकर, सर्वत्र समदृष्टि रखना तथा पूर्णतया निःस्वार्थ होना ही महापुरुषों का सनातन धर्म है ॥5॥
 
Being devoid of affection, ego and hope, having equal vision everywhere and being completely selfless is the eternal religion of great men. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)