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mahabharat 14.38.2-3: आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, प्रसन्नता, कृपणता का अभाव, अभय, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, किसी के दोष न देखना, पवित्रता, चतुराई और वीरता - ये सत्त्वगुण के कार्य हैं ॥2-3॥   |   mahabharat अध्याय 14.38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  14.38.2-3 
आनन्द: प्रीतिरुद्रेक: प्राकाश्यं सुखमेव च।
अकार्पण्यमसंरम्भ: सन्तोष: श्रद्दधानता॥ २॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम्।
अक्रोधश्चानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रम:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, प्रसन्नता, कृपणता का अभाव, अभय, संतोष, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोध का अभाव, किसी के दोष न देखना, पवित्रता, चतुराई और वीरता - ये सत्त्वगुण के कार्य हैं ॥2-3॥
 
Joy, happiness, progress, light, happiness, absence of miserliness, fearlessness, contentment, faith, forgiveness, patience, non-violence, equality, truth, simplicity, absence of anger, not seeing anyone's faults, purity, cleverness and bravery - these are the functions of Sattva Guna. 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)