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mahabharat 14.38.1: ब्रह्माजी बोले - 'हे मुनियों! अब मैं तीसरे सत्त्वगुण का वर्णन करूँगा, जो संसार के समस्त प्राणियों के लिए हितकारी है और महापुरुषों का प्रशंसनीय गुण है।॥1॥   |   mahabharat अध्याय 14.38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 38: सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.38.1 
ब्रह्मोवाच
अत: परं प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम्।
सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - 'हे मुनियों! अब मैं तीसरे सत्त्वगुण का वर्णन करूँगा, जो संसार के समस्त प्राणियों के लिए हितकारी है और महापुरुषों का प्रशंसनीय गुण है।॥1॥
 
Brahma said, 'O sages! Now I will describe the third virtue (Sattva Guna), which is beneficial to all creatures in the world and is the praiseworthy virtue of great men.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)