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mahabharat 14.35.50: जो पुरुष सम्पूर्ण तत्त्वों, गुणों और सम्पूर्ण देवताओं को यथार्थतः जान लेता है, उसके पाप धुल जाते हैं और वह बन्धन से मुक्त होकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों का सुख भोगता है ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 14.35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  14.35.50 
तत्त्वानि यो वेदयते यथातथं
गुणांश्च सर्वानखिलांश्च देवता:।
विधूतपाप्मा प्रविमुच्य बन्धनं
स सर्वलोकानमलान् समश्नुते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष सम्पूर्ण तत्त्वों, गुणों और सम्पूर्ण देवताओं को यथार्थतः जान लेता है, उसके पाप धुल जाते हैं और वह बन्धन से मुक्त होकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों का सुख भोगता है ॥50॥
 
One who truly knows all the elements, qualities and all the gods, his sins are washed away and he becomes free from bondage and experiences the happiness of all the divine worlds. 50॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)