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श्लोक  14.35.37 
चातुर्विद्यं तथा वर्णाश्चातुराश्रमिकान् पृथक्।
धर्ममेकं चतुष्पादं नित्यमाहुर्मनीषिण:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार मैं प्रत्येक वर्ग और आश्रम के लिए चार भिन्न विषयों का वर्णन करूँगा। विद्वान् विद्वान् लोग सदैव चार चरणों वाले एक ही धर्म की बात करते हैं।
 
Similarly, I will describe four different subjects for each class and ashram. Wise scholars always talk about one religion with four steps.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)