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mahabharat 14.35.17: जो विद्वान् पुरुष संयोग और वियोग को, तथा एकत्व और अनेकत्व को उनके वास्तविक स्वरूप में समझ लेता है, वह दुःख से मुक्त हो जाता है ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 14.35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  14.35.17 
यो विद्वान् सहसंवासं विवासं चैव पश्यति।
तथैवैकत्वनानात्वे स दु:खात् परिमुच्यते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान् पुरुष संयोग और वियोग को, तथा एकत्व और अनेकत्व को उनके वास्तविक स्वरूप में समझ लेता है, वह दुःख से मुक्त हो जाता है ॥17॥
 
The learned man who understands union and separation, as well as oneness and diversity in their true essence, becomes free from sorrow. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)