Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.35.16: हम ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और त्याग को ही सर्वश्रेष्ठ तप मानते हैं। जो अखंड ज्ञानतत्त्व को निश्चयपूर्वक जानता है और स्वयं को सब प्राणियों में स्थित देखता है, वह सर्वव्यापी माना जाता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 14.35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 35: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष-धर्मका वर्णन—गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  14.35.16 
ज्ञानं त्वेव परं विद्म: संन्यासं तप उत्तमम्।
यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात्।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हम ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और त्याग को ही सर्वश्रेष्ठ तप मानते हैं। जो अखंड ज्ञानतत्त्व को निश्चयपूर्वक जानता है और स्वयं को सब प्राणियों में स्थित देखता है, वह सर्वव्यापी माना जाता है ॥16॥
 
We consider knowledge as the supreme being and renunciation as the best penance. One who knows the uninterrupted knowledge principle with certainty and sees himself situated within all beings, is considered to be omnipresent. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)