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श्लोक 14.33.8  |
तस्मात् ते सुभगे नास्ति परलोककृतं भयम्।
तद्भावभावनिरता ममैवात्मानमेष्यसि॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| इसलिए हे देवी! तुम्हें परलोक का किंचितमात्र भी भय नहीं होना चाहिए। भगवान के भाव में लीन रहकर तुम अन्त में मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाओगी। 8॥ |
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| That's why Devi! You should not have the slightest fear for the next world. By remaining immersed in the feeling of God, you will ultimately attain my form. 8॥ |
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
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