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mahabharat 14.30.26: ब्राह्मण बोला - देवि ! तत्पश्चात् अलर्क ने उसी वृक्ष के नीचे बैठकर घोर तप किया, किन्तु उसे मन-बुद्धि सहित पाँचों इन्द्रियों को मारने में समर्थ कोई अच्छा बाण नहीं मिला ॥26॥   |   mahabharat अध्याय 14.30: अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.30.26 
ब्राह्मण उवाच
ततोऽलर्कस्तपो घोरं तत्रैवास्थाय दुष्करम्।
नाध्यगच्छत् परं शक्त्या बाणमेतेषु सप्तसु॥ २६॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - देवि ! तत्पश्चात् अलर्क ने उसी वृक्ष के नीचे बैठकर घोर तप किया, किन्तु उसे मन-बुद्धि सहित पाँचों इन्द्रियों को मारने में समर्थ कोई अच्छा बाण नहीं मिला ॥26॥
 
The Brahmin said – Goddess! Thereafter, Alarka sat under the same tree and performed severe penance, but he could not find any good arrow capable of killing the five senses including the mind and intellect. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)