श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 30: अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  14.30.22-23h 
चक्षुरुवाच
नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन।
तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि॥ २२॥
अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि।
 
 
अनुवाद
नेत्र ने कहा - अलर्क! ये बाण मुझे किसी भी प्रकार से छेद नहीं सकते। ये तुम्हारे प्राणों को छेद देंगे और प्राणों के छेदित हो जाने पर तुम्हें अपने प्राण गँवाने पड़ेंगे। अतः तुम अन्य प्रकार के बाणों की व्यवस्था करो, जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे।
 
The eye said - Alarka! These arrows cannot pierce me in any way. These will pierce your vital spots and once the vital spots are pierced, you will have to lose your life. So think of arranging for other types of arrows, with the help of which you will be able to kill me. 22 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)