श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 30: अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  14.30.15 
अलर्क उवाच
स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान् स्पर्शांस्तानेव प्रतिगृध्यति।
तस्मात् त्वचं पाटयिष्ये विविधै: कङ्कपत्रिभि:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अलार्क बोला, "यह चर्म अनेक प्रकार के स्पर्शों को भोगकर पुनः उनकी इच्छा करता है। अतः मैं इस चर्म को अनेक प्रकार के बाणों से छेदकर भेद दूँगा।"
 
Alarka said, "This skin after experiencing various kinds of touches craves for them again. So I shall pierce this skin by shooting it with various kinds of arrows."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)