श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  14.3.3 
आत्मानं मन्यसे चाथ पापकर्माणमन्तत:।
शृणु तत्र यथापापमपकृष्येत भारत॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे भरतनाट्यमपुत्र! यदि तुम अन्ततः अपने को ही युद्धरूपी पापकर्म का मुख्य कारण मानते हो, तो सुनो, मैं तुम्हें वह उपाय बताता हूँ जिससे वह पाप नष्ट हो सकता है॥3॥
 
O son of Bharatanatyam! If you ultimately consider yourself to be the main cause of the sinful act of war, then listen, I will tell you the way by which that sin can be destroyed. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)