श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.3.12 
इमं ज्ञातिवधं कृत्वा सुमहान्तं द्विजोत्तम।
दानमल्पं न शक्नोमि दातुं वित्तं च नास्ति मे॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने बन्धुओं का इतना बड़ा संहार करके अब मुझमें थोड़ा-सा भी दान देने की शक्ति नहीं रही, क्योंकि मेरे पास धन नहीं रहा॥12॥
 
O best of Brahmins! After causing such a great massacre of my brethren, I no longer have the strength to give even a small donation because I have no wealth.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)