श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 3: व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.3.1 
व्यास उवाच
युधिष्ठिर तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मति:।
न हि कश्चित्स्वयं मर्त्य: स्ववश: कुरुते क्रियाम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले- युधिष्ठिर! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारा मन ठीक नहीं है। कोई भी मनुष्य स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं करता।॥1॥
 
Vyasa said- Yudhishthira! It seems to me that you are not in the right mind. No human being does any work independently.॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)