श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 28: ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद*  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.28.4 
अकामयानस्य च सर्वकामा-
नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान्।
न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा-
स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मैं किसी भी कामना की इच्छा नहीं करता। मैं किसी भी दोष से द्वेष नहीं करता। जैसे कमल के पत्ते जल की बूंदों से आवृत नहीं होते, वैसे ही मेरा स्वभाव राग-द्वेष से स्पर्शित नहीं होता। ॥4॥
 
I do not desire any of the desires. I do not hate any of the defects. Just as the lotus leaves are not coated with water droplets, in the same way my nature is not touched by attachment and hatred. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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