| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 28: ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद* » श्लोक 19-20 |
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| | | | श्लोक 14.28.19-20  | अध्वर्युरुवाच
भूमेर्गन्धगुणान् भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान् रसान्।
ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान् गुणान्॥ १९॥
शृणोष्याकाशजान् शब्दान् मनसा मन्यसे मतिम्।
सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे॥ २०॥ | | | | | | अनुवाद | | अध्वर्यु बोले- यते! तुम यह तो मानते हो कि सब प्राणियों में प्राण हैं, फिर भी तुम पृथ्वी की सुगन्धि का आनन्द लेते हो, जलरस का पान करते हो, प्रकाश के गुणों का पान करते हो? तुम रूप को देखते हो और वायु के गुणों का स्पर्श करते हो, आकाश में उत्पन्न होने वाले शब्दों को सुनते हो और मन से मतिका का चिंतन करते हो। 19-20॥ | | | | Adhvaryu said-Yate! You believe that all living beings have life, yet you enjoy the fragrance of the earth, drink the watery juices, the qualities of light? You see the form and touch the qualities of the air, listen to the words born in the sky and contemplate the Matika with your mind. 19-20॥ | | ✨ ai-generated | | |
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