श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 26: अन्तर्यामीकी प्रधानता  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.26.12 
शृणोत्ययं प्रोच्यमानं गृह्णाति च यथातथम्।
पृच्छातस्तदतो भूयो गुरुरन्यो न विद्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
गुरु द्वारा दी गई शिक्षा को श्रोता विभिन्न प्रकार से सुनता है और ग्रहण करता है। अतः प्रश्न पूछने वाले शिष्य के लिए उसके अपने अंतरात्मा से बढ़कर कोई गुरु नहीं है॥12॥
 
The listener hears the teachings given by the Guru and accepts them in different ways. Hence, for a disciple who asks questions, there is no better Guru than his own inner self.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)