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mahabharat 14.26.1: ब्राह्मण बोला, "प्रिये! जगत् का एक ही शासक है, दूसरा कोई नहीं। मैं तो यह कह रहा हूँ कि हृदय में स्थित सर्वशक्तिमान् ही सबके शासक हैं। जैसे ढलान वाले स्थान से जल नीचे की ओर बहता है, वैसे ही उस सर्वशक्तिमान् की प्रेरणा से मुझे जो भी कार्य सौंपा जाता है, मैं उसे करता रहता हूँ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 14.26: अन्तर्यामीकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 26: अन्तर्यामीकी प्रधानता  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.26.1 
ब्राह्मण उवाच
एक: शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता
यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि।
तेनैव युक्त: प्रवणादिवोदकं
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि॥ १॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला, "प्रिये! जगत् का एक ही शासक है, दूसरा कोई नहीं। मैं तो यह कह रहा हूँ कि हृदय में स्थित सर्वशक्तिमान् ही सबके शासक हैं। जैसे ढलान वाले स्थान से जल नीचे की ओर बहता है, वैसे ही उस सर्वशक्तिमान् की प्रेरणा से मुझे जो भी कार्य सौंपा जाता है, मैं उसे करता रहता हूँ॥1॥
 
The Brahmin said, "Dear! There is only one ruler of the world, no other. I am saying that the Almighty who resides in the heart is the ruler of all. Just like water flows downhill from a sloping place, similarly, whatever work I am assigned to by the inspiration of that Almighty, I keep on performing that.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)