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mahabharat 14.24.7: वीर्य और रस से आनन्द उत्पन्न होता है, यह आनन्द उदान रूप है। आनन्द उपर्युक्त कारण और कार्य के बीच व्याप्त और स्थित है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 14.24: देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 24: देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.24.7 
शुक्रात् संजायते चापि रसादपि च जायते।
एतद् रूपमुदानस्य हर्षो मिथुनमन्तरा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वीर्य और रस से आनन्द उत्पन्न होता है, यह आनन्द उदान रूप है। आनन्द उपर्युक्त कारण और कार्य के बीच व्याप्त और स्थित है ॥7॥
 
Joy is generated from semen and juice, this joy is the form of Udana. Joy is spread and situated between the above mentioned cause and effect. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)