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mahabharat 14.21.25-26: ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! वह वाणी प्राण के द्वारा शरीर में प्रकट होती है, फिर प्राण के द्वारा ही अपनेपन का भाव प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह उदान रूप में शरीर से निकलकर व्यान रूप में सम्पूर्ण आकाश में फैल जाती है। तत्पश्चात् उसी वायु में स्थित हो जाती है। इस प्रकार वाणी ने पहले अपनी उत्पत्ति का प्रकार बताया था।* अतः स्थावर होने के कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होने के कारण वाग्देवी श्रेष्ठ है। 25-26॥   |   mahabharat अध्याय 14.21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  14.21.25-26 
ब्राह्मण उवाच
प्राणेन या सम्भवते शरीरे
प्राणादपानं प्रतिपद्यते च।
उदानभूता च विसृज्य देहं
व्यानेन सर्वं दिवमावृणोति॥ २५॥
तत: समाने प्रतितिष्ठतीह
इत्येव पूर्वं प्रजजल्प वाणी।
तस्मान्मन: स्थावरत्वाद् विशिष्टं
तथा देवी जङ्गमत्वाद् विशिष्टा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! वह वाणी प्राण के द्वारा शरीर में प्रकट होती है, फिर प्राण के द्वारा ही अपनेपन का भाव प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह उदान रूप में शरीर से निकलकर व्यान रूप में सम्पूर्ण आकाश में फैल जाती है। तत्पश्चात् उसी वायु में स्थित हो जाती है। इस प्रकार वाणी ने पहले अपनी उत्पत्ति का प्रकार बताया था।* अतः स्थावर होने के कारण मन श्रेष्ठ है और जंगम होने के कारण वाग्देवी श्रेष्ठ है। 25-26॥
 
The Brahmin said- Dear! That speech appears in the body through Prana, then through Prana one attains the feeling of belonging. After that, in the form of Udan, it leaves the body and spreads across the entire sky in the form of Vyan. Thereafter it is established in the same air. In this way speech had earlier explained the type of its origin.* Therefore, due to being immovable, the mind is superior and due to being movable, Vaagdevi is superior. 25-26॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)