श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 21: दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  14.21.16 
ब्राह्मण उवाच
स्थावरं जङ्गमं चैव वि द्ध ॺुभे मनसी मम।
स्थावरं मत्सकाशे वै जङ्गमं विषये तव॥ १६॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण भगवान कहते हैं- हे प्रिये! मेरा मन स्थावर और जंगम दोनों है। यह जो स्थावर संसार है, अर्थात् जो बाह्य इन्द्रियों द्वारा देखा जा सकता है, वह मेरे निकट है और जो जंगम अर्थात् स्वर्ग आदि इन्द्रियों से परे है, वह तुम्हारे अधीन है। 16॥
 
Brahmin God says-Dear! My mind is both immovable and movable. This world which is immovable i.e. which can be perceived by the external senses, is close to me and the movable i.e. the heaven etc. which is beyond the senses, is in your possession. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)