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mahabharat 14.20.12: वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रिय से सूँघा नहीं जा सकता, जीभ से चखा नहीं जा सकता। स्पर्शेन्द्रिय : वह त्वचा से भी स्पर्श नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धि से ही उसका अनुभव किया जा सकता है। 12॥   |   mahabharat अध्याय 14.20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 20: ब्राह्मणगीता—एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.20.12 
घ्राणेन न तदाघ्रेयं नास्वाद्यं चैव जिह्वया।
स्पर्शनेन तदस्पृश्यं मनसा त्ववगम्यते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रिय से सूँघा नहीं जा सकता, जीभ से चखा नहीं जा सकता। स्पर्शेन्द्रिय : वह त्वचा से भी स्पर्श नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धि से ही उसका अनुभव किया जा सकता है। 12॥
 
‘That imperishable Brahman cannot be smelled by the olfactory senses or tasted by the tongue. Sense of touch: It cannot even be touched by the skin; It can be experienced only through the intellect. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)