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श्लोक 14.2.16  |
किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहु:।
विदिता: क्षत्रधर्मास्ते येषां युद्धेन जीविका॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| पिताजी! अब हमारा क्या मूल्य है? हम जो कुछ बार-बार कहते या समझाते हैं, वह सब व्यर्थ की बातें सिद्ध हो रही हैं। आप उन क्षत्रियों के कर्तव्यों को भली-भाँति जानते हैं, जिनकी जीविका युद्ध पर निर्भर है।॥16॥ |
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| ‘Father! What are we worth now? Whatever we repeatedly say or explain is proving to be futile talk. You are well aware of the duties of those kshatriyas whose livelihood depends on war.॥ 16॥ |
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