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श्लोक 14.2.10  |
युधिष्ठिर उवाच
गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम।
सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर बोले- गोविन्द! मैं आपके प्रेम को भली-भाँति जानता हूँ। स्नेह और सौहार्द के कारण आप सदैव मुझ पर कृपा बरसाते रहते हैं॥ 10॥ |
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| Yudhishthira said- Govind! I know very well about your love for me. Out of affection and cordiality you always shower your blessings on me.॥ 10॥ |
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