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श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  14.19.62 
किं पुनर्ब्राह्मणा: पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्रुता:।
स्वधर्मरतयो नित्यं ब्रह्मलोकपरायणा:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
हे पार्थ! फिर उन विद्वान ब्राह्मणों और क्षत्रियों के विषय में क्या कहा जा सकता है जो अपने धर्म से प्रेम करते हैं और ब्रह्मलोक प्राप्ति के साधन में सदैव तत्पर रहते हैं?
 
O Partha! Then what can we say of those learned Brahmins and Kshatriyas who love their religion and are always engaged in the means of attaining Brahmaloka? 62.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)