vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन
»
श्लोक 34
श्लोक
14.19.34
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत्।
तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मन:॥ ३४॥
अनुवाद
शरीर के अन्दर रहते हुए भी आत्मा को बाह्य और आन्तरिक विषयों सहित अपने मन को उस आश्रय में रखना चाहिए जिसमें वह निवास करता है ॥34॥
While living inside the body, the soul should keep its mind including external and internal matters in the shelter in which it resides. 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×