Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.19.33-34h: एकांत में ध्यान करने वाले पुरुष को किस प्रकार योग की प्राप्ति होती है, यह सुनो। श्रुति में पहले दिए गए उपदेशों का मनन करके उसे भी अपने मन को उसी भाग में स्थापित करना चाहिए जहाँ आत्मा निवास करती है। उसे कभी भी उससे आगे न जाने दे। ॥33 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 14.19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  14.19.33-34h 
योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छृणु।
दृष्टपूर्वां दिशं चिन्त्य यस्मिन् संनिवसेत् पुरे॥ ३३॥
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मन: स्थाप्यं न बाह्यत:।
 
 
अनुवाद
एकांत में ध्यान करने वाले पुरुष को किस प्रकार योग की प्राप्ति होती है, यह सुनो। श्रुति में पहले दिए गए उपदेशों का मनन करके उसे भी अपने मन को उसी भाग में स्थापित करना चाहिए जहाँ आत्मा निवास करती है। उसे कभी भी उससे आगे न जाने दे। ॥33 1/2॥
 
Listen to the way in which a person who meditates in solitude attains yoga. After contemplating on the teachings given earlier in the Shruti, he should also establish his mind in the part where the soul resides. Never let it go beyond that. ॥ 33 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)