श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  14.19.3 
आत्मवत् सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियत: शुचि:।
अमानी निरभीमान: सर्वतो मुक्त एव स:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जो शुद्ध और नियमशील है, सब प्राणियों को अपना ही मानता है, जो मान की इच्छा नहीं रखता और जो अभिमान से दूर रहता है, वह पूर्णतया मुक्त है ॥3॥
 
He who is pure and rules-abiding and treats all beings as his own, who has no desire for honour and who stays away from pride, is completely free. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)