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mahabharat 14.17.12: वह रसयुक्त भोजन करता है और दिन में सोता है; और कभी-कभी अनुचित समय पर भोजन करके, खाया हुआ भोजन पचने से पहले ही, अपने शरीर में दोषों (वायु, वायु, पित्त आदि) को बढ़ा लेता है॥ 12॥   |   mahabharat अध्याय 14.17: काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 17: काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.17.12 
रसाभियुक्तमन्नं वा दिवा स्वप्नं च सेवते।
अपक्वानागते काले स्वयं दोषान् प्रकोपयेत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वह रसयुक्त भोजन करता है और दिन में सोता है; और कभी-कभी अनुचित समय पर भोजन करके, खाया हुआ भोजन पचने से पहले ही, अपने शरीर में दोषों (वायु, वायु, पित्त आदि) को बढ़ा लेता है॥ 12॥
 
He eats juicy food and sleeps during the day; and sometimes, by eating at inappropriate times, before the food he has eaten is digested, he aggravates the doshas (air, wind, bile etc.) in his body.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)