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mahabharat 14.17.10: कभी वह दूषित अन्न-पेय ग्रहण करता है, कभी विपरीत गुणों वाली वस्तुएँ खाता है। एक दिन भारी भोजन करता है, वह भी अधिक मात्रा में। कभी-कभी एक बार खाया हुआ भोजन पचता भी नहीं और वह पुनः खा लेता है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 14.17: काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.17.10 
दुष्टा न् नामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च।
गुरु चाप्यमितं भुङ्‍क्ते नातिजीर्णे ऽ पि वा पुन:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
कभी वह दूषित अन्न-पेय ग्रहण करता है, कभी विपरीत गुणों वाली वस्तुएँ खाता है। एक दिन भारी भोजन करता है, वह भी अधिक मात्रा में। कभी-कभी एक बार खाया हुआ भोजन पचता भी नहीं और वह पुनः खा लेता है।॥10॥
 
Sometimes he consumes contaminated food and drink, sometimes he eats things with contradictory qualities. One day he eats heavy food and that too in large quantity. Sometimes the food eaten once is not even digested and he eats again.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)