श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 16: अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  14.16.37 
जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिश:।
लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जन्म लेकर मैंने बार-बार बुढ़ापा, रोग, व्यसन और राग-द्वेष आदि के क्लेशों का अनुभव किया है ॥37॥
 
After being born in this world, I have repeatedly experienced the sorrows of old age, disease, addiction and the conflicts of love and hatred etc. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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