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mahabharat 14.16.30: आत्मा को कहीं भी परम सुख नहीं मिलता । वह किसी भी लोक में सदा नहीं रह सकती । चाहे कोई तपस्या आदि से कितना ही कष्ट सहन करके परम पद पर क्यों न पहुँच जाए, उसे वहाँ से बार-बार नीचे आना ही पड़ता है ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 14.16: अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.16.30 
न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थिति:।
स्थानाच्च महतो भ्रंशो दु:खलब्धात् पुन: पुन:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
आत्मा को कहीं भी परम सुख नहीं मिलता । वह किसी भी लोक में सदा नहीं रह सकती । चाहे कोई तपस्या आदि से कितना ही कष्ट सहन करके परम पद पर क्यों न पहुँच जाए, उसे वहाँ से बार-बार नीचे आना ही पड़ता है ॥30॥
 
The soul does not find ultimate happiness anywhere. It cannot stay forever in any world. No matter how much pain one endures through austerity etc. and reaches the highest position, one has to come down from there again and again. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)