श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 16: अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना  »  श्लोक 22-24
 
 
श्लोक  14.16.22-24 
चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम्।
दीप्यमानं श्रिया ब्राह्मॺा क्रममाणं च सर्वश:॥ २२॥
अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यप:।
तथैवान्तर्हितै: सिद्धैर्यान्तं चक्रधरै: सह॥ २३॥
सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तै: सह।
यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वे स्वतन्त्र गति करने वाले, सिद्ध, शान्त, बुद्धिमान, ब्रह्म के तेज से देदीप्यमान, सर्वत्र विचरण करने वाले और अन्तर्यामी ज्ञान से युक्त थे। वे अदृश्य चक्रधारी सिद्धों के साथ विचरण करते, उनसे वार्तालाप करते और उनके साथ एकान्त में बैठते थे। जैसे वायु बिना आसक्ति के सर्वत्र प्रवाहित होती है, वैसे ही वे भी आसक्ति रहित होकर स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र विचरण करते थे। उनकी पूर्वोक्त महिमा सुनकर ही महर्षि कश्यप उनके पास गए। 22-24॥
 
He was free-moving, accomplished, peaceful, intelligent, resplendent with the brilliance of Brahman, roaming everywhere and knowledgeable in inner knowledge. He used to roam around with the invisible Chakradhari Siddhas, talk to them and sit alone with them. Just as air flows everywhere without being attached anywhere, similarly he used to roam freely everywhere without any attachment. Maharishi Kashyap went to him only after hearing his glory mentioned above. 22-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)