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mahabharat 14.15.6-7: पृथ्वीनाथ! ये दोनों नर और नारायण प्राचीन काल के महान ऋषि थे और एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। अपनी बातचीत में वे दोनों सदैव देवताओं और ऋषियों की वंशावलियों की चर्चा करते तथा युद्ध की विचित्र कथाएँ और कष्ट सुनाते रहते थे।   |   mahabharat अध्याय 14.15: भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 15: भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  14.15.6-7 
तत्र युद्धकथाश्चित्रा: परिक्लेशांश्च पार्थिव।
कथायोगे कथायोगे कथयामासतु: सदा॥ ६॥
ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतु: सदा।
प्रीयमाणौ महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ ७॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! ये दोनों नर और नारायण प्राचीन काल के महान ऋषि थे और एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। अपनी बातचीत में वे दोनों सदैव देवताओं और ऋषियों की वंशावलियों की चर्चा करते तथा युद्ध की विचित्र कथाएँ और कष्ट सुनाते रहते थे।
 
Prithvinath! Both of them were great sages of ancient times, Nara and Narayana, and they loved each other very much. In their conversations, both of them always discussed the lineages of the gods and sages and narrated the strange stories and sufferings of war. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)