श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 15: भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  14.15.35 
इतीदमुक्त: स तदा महात्मना
जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुन:।
तथेति दु:खादिव वाक्यमैरय-
ज्जनार्दनं सम्प्रतिपूज्य पार्थिव॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीनाथ! उस समय जब महात्मा भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा कहा, तब महापराक्रमी अर्जुन ने उनके वचनों का आदर किया और बड़े दुःख के साथ 'तथास्तु' कहकर उनके जाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
 
Prithvi Nath! At that time, when the great soul Lord Krishna said this, the immensely valiant Arjun respected his words and with great sorrow said 'Tathastu' and accepted his proposal to leave.
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)