श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 15: भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  14.15.30-31 
धर्मेण राजा धर्मज्ञ: पातु सर्वां वसुन्धराम्॥ ३०॥
उपास्यमानो बहुभि: सिद्धैश्चापि महात्मभि:।
स्तूयमानश्च सततं वन्दिभिर्भरतर्षभ॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! अनेक सिद्ध मुनियों की संगति से सुशोभित और बन्दियों द्वारा सदैव प्रशंसित, धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर अब सम्पूर्ण पृथ्वी पर धर्मपूर्वक शासन करें। ॥30-31॥
 
O best of the Bharatas! Adorned with the company of many accomplished saints and always praised by the prisoners, the Dharma-knowing King Yudhishthira should now rule the entire earth in a righteous manner. ॥30-31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)