श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 15: भगवान‍् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  14.15.29-30h 
पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमत:।
स्थिता समुद्रवलया सशैलवनकानना॥ २९॥
चिता रत्नैर्बहुविधै: कुरुराजस्य पाण्डव।
 
 
अनुवाद
तात! पाण्डुनन्दन! नाना प्रकार के रत्नों से भरपूर, पर्वतों, वनों और कर्णों सहित समुद्र से घिरी हुई यह सम्पूर्ण पृथ्वी बुद्धिमान कुरुपुत्र युधिष्ठिर के अधीन हो गई। 29 1/2॥
 
Tat! Pandunandan! This entire earth, rich in abundance of gems of various kinds, surrounded by the sea, including mountains, forests and ears, came under the control of the wise son of Kuru, Yudhishthir. 29 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)