तथैव स्वर्गकल्पेषु सभोद्देशेषु कौरव।
रमणीयेषु पुण्येषु सहितस्य त्वयानघ॥ १९॥
कालो महांस्त्वतीतो मे शूरसूनुमपश्यत:।
बलदेवं च कौरव्य तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान्॥ २०॥
सोऽहं गन्तुमभीप्सामि पुरीं द्वारावतीं प्रति।
रोचतां गमनं मह्यं तवापि पुरुषर्षभ॥ २१॥
अनुवाद
निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवन के रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्ग के समान सुखदायी हैं। मुझे आपके यहाँ रहते हुए बहुत दिन बीत गए हैं। इतने दिनों तक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजी के दर्शन नहीं कर सका। वे भैया बलदेव तथा वृष्णिवंश के अन्य महापुरुषों के दर्शन से वंचित रहे। अतः अब मैं द्वारकापुरी जाना चाहता हूँ। पुरुषप्रवर! आप भी मेरे यात्रा प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार करें। 19-21॥
Sinless Kurunandan! The delightful and holy places of this assembly hall are as pleasant as heaven. Many days have passed since I stayed here with you. For so many days I could not see my father Shurasenkumar Vasudevji. He was deprived of seeing Bhaiya Baldev and other great men of Vrishni dynasty. So now I want to go to Dwarkapuri. Purushpravar! You too should gladly accept my travel proposal. 19-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥