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mahabharat 14.113.d9: मैं तीनों लोकों में निश्चिन्त हूँ। दिन हो या रात, मुझे किसी का भय नहीं रहता; किन्तु जब कोई शूद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो मुझे बहुत दुःख होता है।   |   mahabharat अध्याय 14.113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.113.d9 
त्रैलोक्येऽस्मिन् निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन।
न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेग: शूद्रलङ्घनात्॥
 
 
अनुवाद
मैं तीनों लोकों में निश्चिन्त हूँ। दिन हो या रात, मुझे किसी का भय नहीं रहता; किन्तु जब कोई शूद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो मुझे बहुत दुःख होता है।
 
I am free from anxiety in all the three worlds. Be it day or night, I am never afraid of anyone; but I feel bad when a Shudra violates his decorum.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)