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mahabharat 14.113.d36-d37: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के मुख से भागवत-धर्मों को सुनकर ऋषिगण और पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस अद्भुत घटना का विचार करके उन सबने भगवान को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिर ने गोविन्द को बार-बार प्रणाम किया।   |   mahabharat अध्याय 14.113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन  »  श्लोक d36-d37
 
 
श्लोक  14.113.d36-d37 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्‍गुरो:।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुता: कथा:॥
ऋषय: पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम्।
पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्र: पुन: पुन:॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण के मुख से भागवत-धर्मों को सुनकर ऋषिगण और पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस अद्भुत घटना का विचार करके उन सबने भगवान को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिर ने गोविन्द को बार-बार प्रणाम किया।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! After listening to Bhagwat-Dharmas from the mouth of Jagadguru Lord Shri Krishna in the form of Vishnu, the sages and the Pandavas were very happy and thinking about this wonderful incident, they all bowed to the Lord. Dharmanandan Yudhishthira worshiped Govinda again and again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)