श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन  »  श्लोक d34
 
 
श्लोक  14.113.d34 
श्रावयेद्यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोऽथ शृणोति वा।
स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका वर्णन करता है और शुद्ध मन से इसका श्रवण करता है, वह मेरे सान्निध्य को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
 
The person who narrates it with devotion and listens to it with a pure mind, attains my union, there is no doubt about it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)