श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन  »  श्लोक d33
 
 
श्लोक  14.113.d33 
एतत् पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम्।
श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तै: श्रोत्रियैश्च विशेषत:॥
 
 
अनुवाद
यह प्रसंग अत्यंत पवित्र, पुण्यदायी, पापनाशक और अत्यंत उत्तम है। सभी मनुष्यों को, विशेषकर श्रोत्रिय विद्वानों को, भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिए।
 
This episode is extremely sacred, meritorious, sin-destroyer and extremely excellent. All human beings, especially Shrotri scholars, should listen to it with devotion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)