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mahabharat 14.113.d25-d26: जो ऋग्वेद के द्वारा होता के रूप में, यजुर्वेद के द्वारा अध्वर्यु के रूप में, प्रवर्तक के रूप में तथा परम पवित्र सामवेद के द्वारा मेरी स्तुति करते हैं तथा जो अथर्ववेद के द्वारा अथर्ववेदीय द्विजों के रूप में मेरी सदैव स्तुति करते हैं, वे भगवान के भक्त माने जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.113.d25-d26 
ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च।
सामवेदेन चोद्‍गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम्॥
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजा:।
स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवता: स्मृता:॥
 
 
अनुवाद
जो ऋग्वेद के द्वारा होता के रूप में, यजुर्वेद के द्वारा अध्वर्यु के रूप में, प्रवर्तक के रूप में तथा परम पवित्र सामवेद के द्वारा मेरी स्तुति करते हैं तथा जो अथर्ववेद के द्वारा अथर्ववेदीय द्विजों के रूप में मेरी सदैव स्तुति करते हैं, वे भगवान के भक्त माने जाते हैं।
 
Those who praise me in the form of Hota through Rigveda, in the form of Adhvaryu through Yajurveda, in the form of originator and praise me through the most sacred Samaveda and those who always praise me through Atharvaveda in the form of Atharvavedic Dwijas, they are considered to be devotees of God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)