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mahabharat 14.113.d21: पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरे भक्त को नमस्कार करता है, चाहे वह चाण्डाल ही क्यों न हो, वह अनन्त लोकों को प्राप्त करता है।   |   mahabharat अध्याय 14.113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.113.d21 
नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयान्वित:।
तस्याक्षयाऽभवँल्लोका: श्वपाकस्यापि पार्थिव॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरे भक्त को नमस्कार करता है, चाहे वह चाण्डाल ही क्यों न हो, वह अनन्त लोकों को प्राप्त करता है।
 
Prithvinath! The person who salutes my devotee with devotion, even if he is a Chandala, attains eternal worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)