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mahabharat 14.111.d57: जो मनुष्य प्रतिदिन मुझमें मन लगाकर मेरे सूक्त (पुरुषसूक्त) का पाठ करता है, वह कमल के पत्ते की तरह पाप से कभी लिप्त नहीं होता, जो जल से अछूता रहता है।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d57
 
 
श्लोक  14.111.d57 
मम सूक्तं जपेद् यस्तु नित्यं मद्‍गतमानस:।
न पापेन स लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य प्रतिदिन मुझमें मन लगाकर मेरे सूक्त (पुरुषसूक्त) का पाठ करता है, वह कमल के पत्ते की तरह पाप से कभी लिप्त नहीं होता, जो जल से अछूता रहता है।
 
He who daily recites my Sukta (Purushasukta) with his mind focused on me, is never tainted by sin like the lotus leaf which remains untouched by water.
 
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)