श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d56
 
 
श्लोक  14.111.d56 
भद्रं न इति य: पादं पठन् ऋक् संहितां तदा।
अन्तर्जले वाभ्यादित्ये तस्य पापं प्रणश्यति॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य जल में बैठकर अथवा सूर्य की ओर देखकर भद्रं न:ओ ऋचा अथवा ऋग्वेद का एक श्लोक पढ़ता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
 
A person who, sitting in water or looking towards the Sun, recites one verse of the Richa 'Bhadram Na:0'* or the Rigvedi, all his sins are destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)