Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.111.d55: फिर प्रणव का उच्चारण करके उसे पात्र से निकालकर प्रणव का उच्चारण करते हुए पी लें। इस प्रकार ब्रह्मकुच पीने से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से भी उसी प्रकार छूट जाता है, जैसे साँप अपनी केंचुली से अलग हो जाता है। | mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिबेत् तु प्रणवेन तु।
महतापि स पापेन त्वचेवाहिर्विमुच्यते॥
अनुवाद
फिर प्रणव का उच्चारण करके उसे पात्र से निकालकर प्रणव का उच्चारण करते हुए पी लें। इस प्रकार ब्रह्मकुच पीने से मनुष्य बड़े-बड़े पापों से भी उसी प्रकार छूट जाता है, जैसे साँप अपनी केंचुली से अलग हो जाता है।
Then after pronouncing Pranava, take it out from the vessel and drink it while reciting Pranava. By drinking Brahmakuch in this manner, a man gets rid of even the biggest sins in the same way as a snake gets separated from its skin.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥