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mahabharat 14.111.d51: भरतनंदन! अब मैं ब्रह्मकुच और उसके पात्र का वर्णन करूँगा, सुनो। ब्रह्मकुच को पलाश या कमल के पत्ते में अथवा ताँबे या सोने के पात्र में रखकर पीना चाहिए। ये ही उसके उपयुक्त पात्र कहे गए हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d51
 
 
श्लोक  14.111.d51 
पात्रं च ब्रह्मकूर्चं च शृणु तत्र च भारत।
पलाशं पद्मपत्रं च ताम्रं वाथ हिरण्मयम्।
सादयित्वा तु गृह्णीयात् तत् तु पात्रमुदाहृतम्॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! अब मैं ब्रह्मकुच और उसके पात्र का वर्णन करूँगा, सुनो। ब्रह्मकुच को पलाश या कमल के पत्ते में अथवा ताँबे या सोने के पात्र में रखकर पीना चाहिए। ये ही उसके उपयुक्त पात्र कहे गए हैं।
 
Bharatanandan! Now I will describe Brahmakuch and its vessel, listen. Brahmakuch should be drunk by placing it in a leaf of Palaash or lotus or in a vessel made of copper or gold. These are said to be its suitable vessels.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)