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mahabharat 14.111.d50: इसी प्रकार, जो व्यक्ति हर महीने अलग-अलग मंत्र पढ़कर एकत्रित ब्रह्मकुर्च का पान करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d50
 
 
श्लोक  14.111.d50 
तथैव ब्रह्मकूर्चं तु समन्त्रं तु पृथक् पृथक्।
मासि मासि पिबेद् यस्तु तस्य पापं प्रणश्यति॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार, जो व्यक्ति हर महीने अलग-अलग मंत्र पढ़कर एकत्रित ब्रह्मकुर्च का पान करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।
 
Similarly, the sins of the person who drinks the Brahmakurch collected by reciting different mantras every month are destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)